बस इतनी सी ख्वाहिश ने जिंदगी भर का मुसाफिर बना दिया ....।।।। 8.4.2013
Sunday, April 14, 2013
Monday, May 30, 2011
दर्पण बनकर जियो.........
जंगल राज ..........
एक नन्हा मेमना
और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे
बच्चे को थामने।
छिटककर बोला बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-
हे बकरी - कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव!
चिरायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
चुनाव आनेवाला है।
धर्म क्वांटिटी नहीं, क्वालिटी मांगता है........
धर्म क्वांटिटी नहीं, क्वालिटी मांगता है। धर्म का क्वांटिटी से, संख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है, धर्म का क्वालिटी से, गुणों से सम्बन्ध है। धर्म कहता है, जो दो रुपये चुराये वह भी चोर है और दो लाख रुपये चुराये, वह भी चोर है। चोरी छोटी–बड़ी हो सकती है लेकिन चोरी तो चोरी है, धर्म की अदालत में दोनों समान दण्ड के पात्र हैं। लेकिन तुम्हारी अदालत में दोनों की सजा भी अलग–अलग होगी। अदालत शब्द का अर्थ है :
अ आओ,
दा देओ,
ल लड़ों
और
त तबाह हो जाओ।
अर्थ हुआ आओ, देओ, लड़ो और तबाह हो जाओ।
अदालत ने बिना तबाह हुए आज तक कौन लौटा है।
अन्त:करण सबसे बड़ी अदालत है,
अन्त:करण की अदालत को साक्षी मानकर जीना है।
पाप मन के भीतर की बात है और अपराध मन के बाहर की बात है। मन में किसी की हत्या कर विचार उठा, यह पाप है और मन के विचार को शरीर से क्रियान्वित कर दिया, किसी की हत्या कर दी, यह अपराध है। अदालत पापी को नहीं पकड़ती। वह अपराधी को पकड़ती है। पाप जब अपराध बन जाता है, तब कानून तुम्हें पकड़ता है। लेकिन प्रभु की अदालत में, धर्म की अदालत में पाप भी अपराध है अपराध भी पाप है।
क्या हो शिक्षा का उद्देश्य.............
आज शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका का साधन रह गया है।
शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, जीवन की साधना भी है।
मनुष्य जब इस सृष्टि में जनम लेता है, तो पूर्ण रूप से मनुष्य नहीं होता।
जब तक मानव– चेतना में सत्संस्कारों का रोपण नहीं होगा, तब तक वह पूर्ण मनुष्यता नहीं पा सकता।
अच्छी शिक्षा व अच्छे संस्कारों से ही आदमी पूर्ण होता है।
शिक्षा वहीं परिपूर्ण होती है जो जीवन में उदात्त विचार, सुसंस्कार तथा जीवन जीने की कला सिखाती हो।
हमें नई पीढ़ी को, उसके परिवार, समाज, धर्म व राष्ट्र के प्रति क्या कर्त्तव्य है, इसका बोध कराना है।
आज स्थिति यह है कि एक बूढ़ा बाप अपने चार बच्चों की परवरिश तो कर सकता है, लेकिन चार बेटे मिलकर भी अपने बूढ़े मां–बाप की परवरिश नहीं कर पाते हैं।
याद रखना– जो अपने बूढ़े मां–बाप का नहीं हो सका, वह परमात्मा का हो जाए, असंभव है।
जो सुख समर्पण में है, वह अकड़ने में नहीं है............
क्रोध तात्कालिक पागलपन है............
क्रोध तात्कालिक पागलपन है। क्रोध अहंकार के पीछे चलता है।
क्रोध और अहंकार सगे भाई हैं।
जिनसे तुम आदर की अपेक्षा करते हो यदि उनसे आदर नहीं मिलता तो तुम्हें क्रोध आ जाता है।
जिनसे तुम प्रेम मांगते हो, प्रेम की, फूलों की आकांक्षा रखते हो, यदि वे घृणा और कांटे थमा देते हैं तो तुम क्रोधित हो जाते हो।
अपेक्षा की उपेक्षा ही क्रोध है। जब–जब अपेक्षा की उपेक्षा होगी, तब–तब तुम्हें क्रोध अवश्य आएगा।
किसी से सम्मान की, प्रेम की, फूलों की अपेक्षा ही मत रखों तो उपेक्षा कौन कर सकता है
और जब उपेक्षा नहीं होगी तो क्रोध स्वत: ही नि:शेष हो जाएगा।
जरा सोचिये .........
जो काम आंखों के इशारे से हो सकता है, उसे हाथ के इशारे से कराना नादानी है
और जो काम हाथ के इशारे से हो सकता हो, उसे मुख से बोलकर कराना नादानी है।
जो काम धीरे से बोलकर हो सकता है, उसे क्रोध से चिल्लाकर कराना नादानी है।
इसी प्रकार जो काम हल्के से क्रोध के अभिनय से हो सकता है, उसे अधिकार के बलबूते हल करना पागलपन नहीं तो फिर क्या है?
और अभी तुम यही कर रहे हो, सारी दुनिया यही कर रही है।
यही एकमात्र कारण है कि संसार में इतनी वैमनस्यता, बिखराव, संघर्ष, दु:ख पनप रहे हैं।
किसी को जीतना है तो तलवार से नहीं, प्यार से जीतो, क्रोध से नहीं, क्षमा से जीतो।
यदि सामने वाला उग्र– स्वभावी है, प्रचंड–प्रकृति है, यदि वह आग है, आग का गोला बनता है
तो तुम्हें पानी बन जाना चाहिए, क्योंकि पानी ही आग पर काबू पा सकता है।
आग का समाधान जल है और क्रोध का समाधान क्षमा है
सुख के साथ शांति होने पर सफलता स्थायी होगी...........
सुख अर्जित करना एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।
पढ़ा-लिखा हो या बिना पढ़ा-लिखा,
आजकल इतना सक्षम और जुगाड़ू तो आदमी होता ही जा रहा है
कि इधर-उधर से सुख उठा ही लेता है।
"""""""""सुख की सामान्य परिभाषा है कि जो हमारे अनुकूल हो, वह सुख तथा विपरीत हो वह दुख"""""""""
सुख अर्जित करना बहुत कठिन काम नहीं है।
परंतु सवाल यह है कि शांति कहां से लाएंगे?
यह तो आदमी को खुद अर्जित करनी पड़ेगी। सुख के साथ जब शांति होगी,
तभी सफलता सही और स्थायी होगी तथा जीवन सुंदर होगा।
साधु और संत ..........
परमात्मा और धैर्य....
इस समय हर आदमी बहुत तेजी में है।प्रतीक्षा कोई नहीं करना चाहता।
जल्दी के चक्कर में इंसानियत ने एक बात खो दी है और वह है धैर्य।
परमात्मा उन्हें ही मिलता है, जिनके पास धीरज है।
जिनकी जीवन यात्रा में धैर्य होता है, वे थोड़ा अपने आसपास भी देख पाते हैं।
जो जल्दी में हैं, उन्हें इतनी फुर्सत कहां कि वे अपने आसपास के लोगों को देख सकें।
पराए तो दूर, ये जल्दीबाजी वाले अपने सगे लोगों पर भी ध्यान नहीं दे पाते।
यही जल्दी इन्हें अपने लोगों के लिए समय के मामले में कंगाल बना देती है।
जीवन में धैर्य हमें इस बात के लिए प्रेरित करता है कि हम अपनी सेवा और सहयोग से दूसरों को सुखी बनाएं।
जब दूसरे विपत्ति में हों तो उन्हें देख हमारा धीरजभरा स्वभाव हमें प्रेरित करता है कि हम उनकी मदद करें।
धैर्य का एक और गुण है कि दूसरों को सुखी देख वह हमारे भीतर प्रसन्नता भरता है।
वरना आजकल लोग अपने दुख से कम, बल्कि दूसरों के सुख से ज्यादा दुखी रहते हैं।
अधीरता के कारण लोगों की प्रतीक्षा की क्षमता ही खत्म हो गई है।
ऐसे में संसार तो मिल जाएगा, पर परमात्मा नहीं और बिना परमात्मा के शांति कैसे मिलेगी?
भगवान हर घड़ी हमारी ओर हाथ बढ़ाता है,
लेकिन हम देख नहीं पाते, क्योंकि जल्दी में हैं।
बाहर की गति तो रहे, पर भीतर का धैर्य बना रहे तो
दुनिया भी मिलेगी और दुनिया बनाने वाला भी नहीं छूटेगा।
जब भी जीवन में निराशा आए, अपने पुराने सड़े-गले विचारों को त्यागें..
अनेक तरह से बलशाली लोग भी मानसिक दुर्बलता के शिकार पाए जाते हैं।
जब भी जीवन में निराशा आए, अपने पुराने सड़े-गले विचारों को त्यागें।
विचार भी लगातार बने रहने से बासी हो जाते हैं, इन्हें भी मांजना पड़ता है,
इनकी भी साफ-सफाई करनी पड़ती है। कुछ समय स्वयं को विचारशून्य रखना भी विचारों की साफ-सफाई है।
यह शून्यता गलत विचारों को गलाती है।
इसके बाद आने वाले विचार दिव्य और स्पष्ट होंगे।
विचारशून्य होने की स्थिति का नाम ध्यान है।
कुछ लोग काफी समय ध्यान की विधि ढूंढ़ने में लगा देते हैं।
कौन-सी विधि से ध्यान करें, इसमें ही उनके जीवन का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है।
थोड़ा समझें कि ध्यान की कोई विधि नहीं होती।
ध्यान एक ऐसा होश है, जो अपनी शून्यता से विचारों को धो देता है।
ताजे और प्रगतिशील विचार रोम-रोम में समाते हैं और उनके नियमित उपयोग की कला भी आ जाती है।
हर विधि एक रास्ता है, पर बाधा को हटाने के लिए उसे ही ध्यान मान लेना गलत होगा।
पीड़ादायक स्मृतियों को भुला देना बुद्धिमानी है.....
पीड़ादायक स्मृतियों को भुला देना बुद्धिमानी है और अच्छी बातों को याद रखना समझदारी,
लेकिन यदि अच्छी बातें सही समय पर आचरण में न उतारी गईं तो ये भी बोझ बन जाएंगी।
कुछ घटनाएं जीवन में ऐसी होती रहती हैं कि जिन्हें यदि नहीं भुलाया गया तो वे हमें मानसिक उधेड़-बुन में पटक देती हैं
और एक घटना फिर कई विपरीत घटनाओं को जन्म देने वाली बन जाती है।
इसलिए अप्रिय प्रसंगों को तत्काल विस्मृत करें। इनको सतत याद रखने का नाम है चिंता।
चिंता करने वाला आदमी कुछ समय बाद अवसाद में जरूर डूबेगा।
प्रिय और अच्छी स्थितियां सदुपयोग के लिए होती हैं। अपने शुभ कर्मो को एक जगह अपनी स्मृति में स्टॉक की तरह रखना चाहिए
और उनका उपयोग भविष्य में करते रहना चाहिए।
चार तरीके से अपने शुभ कर्मो को दूसरों के प्रति उपयोग करें।
पहला, अपने से छोटी उम्र के लोगों से अपने शुभ कर्म जोड़ें, इससे स्नेह बढ़ेगा।
दूसरा,अपने दोस्त, पति-पत्नी से शुभ कर्म जुड़कर प्रेम का रूप ले लेते हैं।
तीसरा तरीका है अपने से बड़े यानी माता-पिता, गुरु तथा वृद्धजन के प्रति जुड़े हुए शुभ कर्म श्रद्धा का रूप ले लेते हैं।
जैसे ही हमारे शुभ कर्म चौथे चरण में परमात्मा के प्रति जुड़ते हैं, बस फिर इसे भक्ति कहा जाएगा।
इसलिए अशुभ, अप्रिय और अनुचित घटे हुए को भूल जाएं,
शुभ को याद रखते हुए उनका इन चार चरणों में सदुपयोग करें। इसका सीधा असर आपके स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
सियासत ...........
मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत, दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है
तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर
हुकूमत, मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है
हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते आगे शाही टुकड़ा डाल देती है
कहाँ की यात्रा कैसा सफ़र कैसा जुदा होना
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है
भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है,और तिनका डाल देती है
अजीब खेल है दुनिया तेरी सियासत का............
मैं खुल के हँस तो रहा हूँ गरीब होते हुए
वो मुस्कुरा भी न पाया अमीर होते हुए
अजीब खेल है दुनिया तेरी सियासत का
मैं पैदलों से पिटा हूँ वज़ीर होते हुए
ये ख़ुशी की धुन का ख़याल रखते हैं...
परिंदे चुप नहीं रहते बंदी होते हुए
नये तरीक़े से मैंने ये जंग जीती है
कमान फेंक दी तरकश में तीर होते हुए
जिसे भी चाहिए मुझसे दुआएँ ले जाए
लुटा रहा हूँ मैं दौलत, गरीब होते...
बदनाम हुआ बेचारा झूठ...........
उसने मुझसे बोला झूठ
अपना पहला पहला झूठ
ताकतवर था खूब मगर
फिर भी सच से हारा झूठ
अब मैं तुझको भूल गया
आधा सच है आधा झूठ
सच से आगे निकल गया
गूंगा, बहरा, अंधा झूठ
कुछ तो सच के साथ रहे
ज्यादातर को भाया झूठ
जग में खोटे सिक्के सा
चलता खुल्लम खुल्ला झूठ
शक्ल हमेशा सच की एक
पल पल रूप बदलता झूठ
इस दुनिया की मंडी में
सच से महंगा बिकता झूठ
सच से बढ़ कर लगा मुझे
उसका प्यारा प्यारा झूठ
माँ से बढ़कर पापा हैं
कितना भोला भाला झूठ
सच ने क्या कम घर तोड़े
बदनाम हुआ बेचारा झूठ...........