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Friday, April 29, 2011

परिवार बचा नहीं है.....

जरा याद कीजिए, पिछली बार कब हमसे किसी ने अपनी मां, पिता, पत्नी, बेटे या बेटी के साथ बैठकर बेतरती की गप मारी थी. कब हममें से किसी ने ये जानने की कोशिश की थी कि वो बहन, जो अपने घर में अपने पारिवारिक उलझनों के बीच राखी की डोर हमें बांधती है, उसका घर कैसे चल रहा है. वो भाई, जिसकी बीवी काम के सिलसिले में किसी दूसरे शहर कुछ दिनों के लिए गई है, उसके बच्चे कैसे घर पर अपना काम कर रहे हैं. फोन पर ही बेटे की आवाज सुनकर दिनभर खुशी से गाने गुनगुनाने वाली मां से कब हममें से किसी ने ये पूछा कि पैरों के जोड़ का दर्द ज्यादा तो नहीं. हम ये सब नहीं पूछते. हां, हम ये जरूर कहते हैं कि आज के जमाने में परिवार बचा नहीं है.

सच्चा दोस्त ......

हमारे मन का स्वभाव ऐसा है कि वह मीठा बोलने वालों को ही ज्यादा पंसंद करता है। अच्छे-बुरे से मन को कुछ लेना-देना नहीं। असली दोस्त की पहचान में भी इसी कारण से इंसान से भूल हो जाती है। व्यक्ति मीठा बोलने वाले मनोरंजक व्यक्ति को ही अपना पक्का दोस्त समझ बैठते हैं, जबकि असलियत में ऐसा कुछ होता नहीं। इस विषय में कबीरदास जी ने बहुत सही बात कही है- निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटि छवाय।

बिन साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।।

इसीलिये कहते हैं सच्चा दोस्त उस निदंक की तरह होता है जो अच्छाईयों पर आपकी तारीफ के साथ साथ आपकी बुराईयों को सामने लाकर उनको दूर करने में आपकी मदद करता है।

MAA--BAAP

Maa ki god,Pita ka sar pe hath

yaad aa raha h sab ek sath

Rote rote wo maa se lipat jana

Aansuo k sang houle se muskrana

yad aata h maa ka awaz lagana

chupke se aangan me daud k ana

Wo maa ka apne hathon se roti khilana

pita ki unglee pakad k ghumne Jana

Zid me jam k shor machana

ruthna,machalna maa ko satana

Ab na koi zid h na ruthna manana

bhul gaye h hum wo muskurana

Sabhyata ki aad me ye hum kahan kho gaye.

lagta h ab hum bade ho gaye

Thursday, April 28, 2011

प्रकृति , विकृति ,संस्कृति........

मनुष्य के तीन स्वभाव है :
(1) प्रकृति
(2) विकृति
(3) संस्कृति।


भूख लगे तो खाना प्रकृति है। भूख नहीं लगे तब भी खाना विकृति है और स्वयं भूखे रहकर दूसरों को खिलाना संस्कृति है। भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवतुल्य माना गया है, लेकिन आज के मनुष्य की भूख तो इतनी बढ़ गई है वह संस्कृति को ही खाना चाहता है। पहले जब आदमी जंगली था, तो कंदमूल खाता था। फिर जब थोड़ा समझदार हुआ तो अन्न खाने लगा। अब सभ्य हुआ तो रुपए को ही खाने लगा। याद रखना, भूख भोजन से मिटती है, रुपए से नहीं। जो दूसरों की भूख मिटाता है, वह कभी भूखा नहीं रहता। जो प्यासे को पानी पिलाता है, वह कभी प्यासा नहीं रहता।

बच्चों को संस्कार देने की उम्र क्या हो .....

एक निश्चित उम्र गुजरने के बाद बच्चों को संस्कार दे पाना कठिन हो जाता है..
एक महिला अपने बच्चे को लेकर आइंस्टीन के पास पहुंची और उनसे पूछा– मैं इसे पढ़ाना चाहती हूं, कब से पढ़ाना शुरू करूं? आइंस्टीन ने पूछा – इसकी उम्र क्या है? महिला ने बताया – पांच वर्ष। आइंस्टीन ने कहा – बहन! तुम बहुत लेट हो गई। अब तक तो इसकी पढ़ाई पूरी हो जानी चाहिए थी, क्योंकि संस्कार तो पांच साल की उम्र तक ही दिए जा सकते हैं।

धन का स्थान...

धन मंजिल नहीं, मार्ग है। धन तो हाथ का मैल है। उस पर जीवन न्यौछावर करना निरी मूर्खता है।धन का जीवन में वही स्थान होना चाहिए, जो शरीर में जूतों का होता है। और धर्म का वह स्थान होना चाहिए, जो शरीर में टोपी का होता है। धर्म सिर की टोपी है और धन पांव का जूता। यही सूत्र मानकर धन का संग्रह करना और धर्म का पालन करना।

मक्खीचूस, कंजूस, उदार और दाता की परिभाषा...

जो न खुद खाता है, न दूसरा को खिलाता है, वह मक्खीचूस है। जो खुद तो खाता है, लेकिन दूसरों को नहीं खिलाता है, वह कंजूस है। जो स्वयं भी खाता है, दूसरों को भी खिलाता है, वह उदार है तथा जो स्वयं न खाकर दूसरों को खिला देता है, वह दाता है। दाता दुनिया का सबसे समझदार इंसान है और कंजूस सबसे बड़ा मूर्ख है। वह धन का मालिक नहीं, गुलाम होता है। मैं धन का विरोधी नहीं हूँ। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि धन का जो स्थान है, उसे उसी स्थान पर रखना चाहिए। जूता पांवों के लिए आवश्यक चीज है। कांटे न चुभें, कंकर न चुभें, चोट न लगे, पांव न जले , इसके लिए जूता होना चाहिए, मगर जूते पांवों के लिए हैं, सिर पर रखकर घूमने के लिए नहीं। यदि कोई जूता सिर पर रखकर घूमने लगे तो आप उसे क्या कहेंगे? मूर्ख! और धन जो जीवन का साधन है उसे साध्य मान लिया जाए तो क्या समझदारी होगी? और कुछ लोग धन को जीवन से भी महत्वपूर्ण मानते हैं।