Monday, May 30, 2011
दर्पण बनकर जियो.........
जंगल राज ..........
एक नन्हा मेमना
और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे
बच्चे को थामने।
छिटककर बोला बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-
हे बकरी - कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव!
चिरायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
चुनाव आनेवाला है।
धर्म क्वांटिटी नहीं, क्वालिटी मांगता है........
धर्म क्वांटिटी नहीं, क्वालिटी मांगता है। धर्म का क्वांटिटी से, संख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है, धर्म का क्वालिटी से, गुणों से सम्बन्ध है। धर्म कहता है, जो दो रुपये चुराये वह भी चोर है और दो लाख रुपये चुराये, वह भी चोर है। चोरी छोटी–बड़ी हो सकती है लेकिन चोरी तो चोरी है, धर्म की अदालत में दोनों समान दण्ड के पात्र हैं। लेकिन तुम्हारी अदालत में दोनों की सजा भी अलग–अलग होगी। अदालत शब्द का अर्थ है :
अ आओ,
दा देओ,
ल लड़ों
और
त तबाह हो जाओ।
अर्थ हुआ आओ, देओ, लड़ो और तबाह हो जाओ।
अदालत ने बिना तबाह हुए आज तक कौन लौटा है।
अन्त:करण सबसे बड़ी अदालत है,
अन्त:करण की अदालत को साक्षी मानकर जीना है।
पाप मन के भीतर की बात है और अपराध मन के बाहर की बात है। मन में किसी की हत्या कर विचार उठा, यह पाप है और मन के विचार को शरीर से क्रियान्वित कर दिया, किसी की हत्या कर दी, यह अपराध है। अदालत पापी को नहीं पकड़ती। वह अपराधी को पकड़ती है। पाप जब अपराध बन जाता है, तब कानून तुम्हें पकड़ता है। लेकिन प्रभु की अदालत में, धर्म की अदालत में पाप भी अपराध है अपराध भी पाप है।
क्या हो शिक्षा का उद्देश्य.............
आज शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका का साधन रह गया है।
शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, जीवन की साधना भी है।
मनुष्य जब इस सृष्टि में जनम लेता है, तो पूर्ण रूप से मनुष्य नहीं होता।
जब तक मानव– चेतना में सत्संस्कारों का रोपण नहीं होगा, तब तक वह पूर्ण मनुष्यता नहीं पा सकता।
अच्छी शिक्षा व अच्छे संस्कारों से ही आदमी पूर्ण होता है।
शिक्षा वहीं परिपूर्ण होती है जो जीवन में उदात्त विचार, सुसंस्कार तथा जीवन जीने की कला सिखाती हो।
हमें नई पीढ़ी को, उसके परिवार, समाज, धर्म व राष्ट्र के प्रति क्या कर्त्तव्य है, इसका बोध कराना है।
आज स्थिति यह है कि एक बूढ़ा बाप अपने चार बच्चों की परवरिश तो कर सकता है, लेकिन चार बेटे मिलकर भी अपने बूढ़े मां–बाप की परवरिश नहीं कर पाते हैं।
याद रखना– जो अपने बूढ़े मां–बाप का नहीं हो सका, वह परमात्मा का हो जाए, असंभव है।
जो सुख समर्पण में है, वह अकड़ने में नहीं है............
क्रोध तात्कालिक पागलपन है............
क्रोध तात्कालिक पागलपन है। क्रोध अहंकार के पीछे चलता है।
क्रोध और अहंकार सगे भाई हैं।
जिनसे तुम आदर की अपेक्षा करते हो यदि उनसे आदर नहीं मिलता तो तुम्हें क्रोध आ जाता है।
जिनसे तुम प्रेम मांगते हो, प्रेम की, फूलों की आकांक्षा रखते हो, यदि वे घृणा और कांटे थमा देते हैं तो तुम क्रोधित हो जाते हो।
अपेक्षा की उपेक्षा ही क्रोध है। जब–जब अपेक्षा की उपेक्षा होगी, तब–तब तुम्हें क्रोध अवश्य आएगा।
किसी से सम्मान की, प्रेम की, फूलों की अपेक्षा ही मत रखों तो उपेक्षा कौन कर सकता है
और जब उपेक्षा नहीं होगी तो क्रोध स्वत: ही नि:शेष हो जाएगा।
जरा सोचिये .........
जो काम आंखों के इशारे से हो सकता है, उसे हाथ के इशारे से कराना नादानी है
और जो काम हाथ के इशारे से हो सकता हो, उसे मुख से बोलकर कराना नादानी है।
जो काम धीरे से बोलकर हो सकता है, उसे क्रोध से चिल्लाकर कराना नादानी है।
इसी प्रकार जो काम हल्के से क्रोध के अभिनय से हो सकता है, उसे अधिकार के बलबूते हल करना पागलपन नहीं तो फिर क्या है?
और अभी तुम यही कर रहे हो, सारी दुनिया यही कर रही है।
यही एकमात्र कारण है कि संसार में इतनी वैमनस्यता, बिखराव, संघर्ष, दु:ख पनप रहे हैं।
किसी को जीतना है तो तलवार से नहीं, प्यार से जीतो, क्रोध से नहीं, क्षमा से जीतो।
यदि सामने वाला उग्र– स्वभावी है, प्रचंड–प्रकृति है, यदि वह आग है, आग का गोला बनता है
तो तुम्हें पानी बन जाना चाहिए, क्योंकि पानी ही आग पर काबू पा सकता है।
आग का समाधान जल है और क्रोध का समाधान क्षमा है